Friday, August 19, 2005

कोई नहीं

-कमलेश भट्ट कमल
ज्योति बाबू ने प्लास्टिक की लीड पाईप नल की टोंटी में लगा कर पानी खोल दिया। पानी बड़ी तेजी से लंबे पाईप में दौड़ने लगा। पाईप के बीच में हवा के कुछ बुलबुले फँसे हुए थे, जो पानी की गति से ही पाईप के दूसरे छोर की ओर भागे जा रहे थे। कई जगह से गोल-गोल लपेटे गये पाईप में इन बुलबुलों की गति से ही पानी की गति का अंदाजा लग रहा था। ज्योति बाबू को लगा की मनुष्य भी तो इन्हीं बुलबुलों की तरह है, जो वक्त के पाईप में दुनिया की भीड़ के साथ भागता रहता है और एक दिन वह इस पाईप के मुहाने पर पहुँच कर समाप्त हो जाता है, प्रकृति में ही समाहित हो जाता है।
जब तक ज्योति बाबू पाईप के दूसरे छोर तक पहुँचे, पानी पहुँच चुका था और क्यारी में फैलने लगा था। बीच में फँसे बुलबुले एक-एक करके बाहर निकल गये और पानी समान गति से प्रवाहित होने लगा। उन्होंने पाईप के मुँह पर हल्के से उँगली लगा दी पानी की पतली-पतली कई धारें, फब्बारे की शक्ल में, टमाटर के पौधों को भिगोने लगीं।
टमाटर के पौधों में पानी लगाना, सुबह उठने के बाद ज्योति बाबू का पहला काम था, यह पौधे उन्होंने जरा देर से लगाये थे। करीब-करीब दिसंबर बीतते-बीतते।
यूँ तो रिटायरमेंट के बाद ज्योति बाबू ने इस क्यारी को कई तरह से उपयोग करने की योजना बनाई थीं लेकिन, फिलहाल अन्य योजनाओं में समय ज्यादा लगने की संभावना के कारण उन्होंने टमाटर लगाने का निर्णय ले लिया था। ढाई सौ गज के प्लाट में पीछे यह जगह एक गड्ढे रूप में उन्हें मिली थी। मकान बनने के समय इसमें इतना सीमेंट, मोरंग और कूड़ा-करकट भर गया था कि इसे क्यारी की शक्ल देने में ज्योति बाबू को कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी।
उन्हीं दिनों सब्जियों भाव अचानक आसमान छूने लगे थे। टमाटर के भाव साठ और सत्तर रुपये किलो तक पहुँच गये थे। टमाटर की इस अप्रत्याशित मंहगाई ने भी शायद ज्योति बाबू को टमाटर के पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया।
नर्सरी में जब ज्योति बाबू टमाटर के पौधे लेने गये तो नर्सरी वाले के परामर्श से टमाटर के साथ-साथ गोभी और मिर्च के भी कई पौधे खरीद लाये। लेकिन उनमें से ज्यादातर के लिए कंकरीली पथरीली जमीन उपयुक्त साबित नहीं हुई। धीरे-धीरे एक एक करके तमाम पौधे मरते चले गये। एक-दो मिर्च के पौधे तथा कुछ टमाटर के, बचे रह गये। जैसे-जैसे इन पौधों में नई कोपलें फूट रही थीं, ज्योति बाबू का मन भी हरा-भरा होता जा रहा था।
बलुई मिट्टी का क्षेत्र होने से पानी क्यारी से बहुत जल्दी गायब हो जाता। तीसरे-चौथे दिन वे क्यारी की निराई-गुड़ाई भी कर डालते। निराई से पौधों को खरपतवार से बचाते और गुड़ाई से उनकी जड़ों को हवा और सूरज की गरमी मिलती। ऐसा करते हुए ज्योति बाबू को कुछ अजब सा सुकून मिलने लगा।
पौधों के साथ रह कर उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा जैसे वे पौधे न होकर एक भिन्न प्रजाति में उनके परिवार का कोई विस्तार है। एक ऐसा परिवार जहाँ जीवन है, जीवन्तता है और विकास की तमाम सारी संभावनाएँ हैं।
ठीक इसी तरह ही तो ज्योति बाबू अपने बच्चों का भी लालन-पालन और देख-रेख करते थे। पढ़ाई-लिखाई, खान-पान, रहन-सहन सब पर पूरी नजर रहती थी उनकी। बच्चे किसके साथ उठ बैठ रहे हैं, कहाँ आ-जा रहे हैं, इन पर उनका पूरा ध्यान रहता था। दोनों लड़कियाँ तो ब्याह कर अपने-अपने घर चली गईं, लेकिन जीवन्त को वे कहाँ बचा पाये खरपतवार से।
इण्टर के बाद जीवन्त ने यूनिवर्सिटी ने प्रवेश क्या लिया, उसकी जीवनचर्या ही बदल गई। रोज नये-नये फैशन की फरमाईश। आये दिन दोस्तों के साथ पिकनिक के कार्यक्रम। देर-सबेर घर आना और पूछने पर बहानेबाजी कर जाना। शुरू में तो इकलौते लड़के के लिए, पत्नी रोहिणी की सिफारिश पर ज्योति बाबू जीवन्त के लिए पैसा मुहैया कराते रहे। लेकिन जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि लड़के के रँगढँग सही नहीं जा रहे हैं। एक दिन वे जीवन्त के बिस्तर के सिरहाने सिगरेट का पैकिट देख कर दमक ही पड़े-
जीवन्त ! तुम्हारे तौर तरीके इस घर के संस्कारों जैसे नहीं लग रहे हैं, तुम, जितनी जल्दी हो सके, इन्हें बदल दो।
डैड आप सिगरेट देखकर इतने हैरान हो रहे हैं ! जमाना बहुत आगे जा रहा है! हम अगर जमाने के साथ-साथ नहीं चले तो बहुत पीछे रह जाएँगे ! जीवन्त ने धृष्टता की हद पार करते हुए कहा।
"जीवन्त, एडवांस होने का यह मतलब तो नहीं कि तुम माँ-बाप से बात करने का तरीका ही भूल जाओ। जिन पैसों को तुम सिगरेट के धएँ में उड़ा रहे हो उसे तुम्हारे पिता ने रात-दिन एक करके, मेहनत और ईमानदारी से कमाया है। तुम्हें शर्म आनी चाहिए अपने आप पर।" -रोहिणी ने पूरी ताकत से हस्तक्षेप किया।
"मॉम तुम डैड की तरफ से बोल रही हो। जब पूरी दुनिया में नम्बर दो के पैसे को समाज ने स्वीकार कर लिया है तो इनकी ईमानदारी का हम क्या करें? अब तक तो मैं नादान था, इन्होंने मुझे जैसा चाहा वैसे रखा। लेकिन अब मैं समझदार हो गया हूं। अब मैं अपने बारे में निर्णय ले सकता हूँ। आज मुझे पैसा चाहिए अपनी जरूरत के लिए। पैसे चाहे ईमानदारी से आएँ या कहीं से छीन-झपटकर और बेईमानी से"। जीवन्त के तरकश में भी तीर खत्म नहीं हो रहे थे।
"जीवन्त आज तू कैसी बातें कर रहा है। कहीं तू नशा करके तो नहीं आया है। बन्द कर यह बकवास।" रोहिणी ने सख्त़ होते हुए कहा।
"मॉम तुम डैड से ज्यादा समझदार हो। आज के टाइम मे दारू पीना कोई पाप नहीं है। यह तो 'लाइफ स्टाइल` है। कौन बड़ा आदमी दारू नहीं पीता और किस बड़े आदमी को दारू पिए बिना नींद आती है आज।" जीवन्त अपनी ढिठाई से बाज आने का नाम नहीं ले रहा था।
जीवन्त की नशे में डूबी ये बातें सुनकर ज्योति बाबू तो सन्न रह गए। रोहिणी भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं रह गई। जिस घर में अण्डा क्या, प्याज-लहसुन तक न खाया गया हो, उसमें ही इकलौता लड़का सिगरेट फूँके और दारू पिए- यह आसानी से हज़म होने वाली घटना नहीं थी।
दोनों चुपचाप जीवन्त के कमरे का दरवाजा उढ़काकर अपने कमरे में चले गए।
......... कितनी-कितनी मन्नतें मानी थीं। उन्होंने इस लड़के के लिए। पूरी उम्र, अवसर मिलने पर भी, काली कमाई को हाथ तक नहीं लगाया था ज्योति बाबू ने। वे कहते थे, अगर हमारी दाल-रोटी मेहनत की कमाई से चल रही है तो अपनी नीयत क्यों खराब करें ? इससे बच्चों के संस्कार बिगड़ते हैं। लेकिन क्या हुआ जीवन्त के संस्कारों का ? पढ़ाई-लिखाई का फायदा क्या यही मिलना था कि इकलौता बेटा दारू के नशे में फिल्मों से डायलाग झाड़े, अपने ही माँ-बाप को ज़लील करे।
शायद संस्कार ही सब कुछ नहीं होते। आदमी जिस वातावरण में, जिन लोगों के साथ रहता है उनका भी असर उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। आखिर टमाटर, गोभी और मिर्च के कितने पौधे लगाए थे। सब स्वस्थ थे। एक ही मिट्टी, पानी और हवा में उन्हें रोपा गया था। लेकिन बचे कितने ? कुछ की जड़ें सड़ गईं। कुछ को कीड़े खा गए। कुछ पनपे भी तो बाद में पीले पड़कर खत्म हो गए। उन्होंने सबकी निराई-गुड़ाई एक-सी ही की थी, सब को एक ही तरह खाद-पानी और प्यार दिया था। ज्योति बाबू बार-बार अपने जीवन-दर्शन को नये सिरे से जाँचने का प्रयास करने लगते।
रोहिणी ने थाल में खाना लगाकर जीवन्त के कमरे में रख दिया। वापस उन्होंने बिस्तर ठीक किया और लेट गईं। ज्योति बाबू से आँख मिलाने का साहस नहीं हो रहा था रोहिणी का।
"बल्ब बुझा दो रोहिणी।"
"क्या अँधेरे में ही बैठे रहोगे ?"
"हाँ, जब भीतर अँधेरा गहराता जा रहा हो तो बाहर का उजाला अच्छा नहीं लगता है।"
"तुम्हें नींद आ रही है रोहिणी?"
"आप सब कुछ जान रहे हैं, फिर भी इस तरह पूछ रहे हैं?"
"कहाँ चूक हो गई हमसे रोहिणी ?"
"आपसे कोई चूक नहीं हुई है। यह समय ही ठीक ऐसा है। इसमें जितना सोचेंगे, उतना ही परेशान होंगे। ऊपर वाला जो करेगा, ठीक करेगा।"
"क्या तुम पूरे मन से ऐसा कह रही हो रोहिणी?"
"मन को शान्त करने का, इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।"
ज्योति बाबू भी आकर बिस्तर पर लेट गए।
अचानक रोहिणी और ज्योति बाबू ने एक दूसरे को आलिंगन में ले लिया और फफक-फफक कर रो पड़े ......... फिर देर तक रोते रहे।
टमाटर के पौधे धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। उनकी एक-एक दिन की बढ़त का हिसाब था, ज्योतिबाबू के पास। किस पौधे में कितनी टहनियाँ हैं, पिछले दिन किस टहनी में नये पत्ते आए, कौन पौधा कितना लम्बा निकल रहा है। सब कुछ उन्हें याद रहता था। पौधों के बीच जाकर ज्योतिबाबू का मन प्रसन्न हो उठता था। आखिर जीवन तो पौधों में भी है। उनके पास भी जबान होती तो वे भी अपना सुख- दुख, अपनी भूख-प्यास बताते। जबान नहीं है तो सारी जरूरतों का अनुमान आदमी को ही लगाना पड़ता है।
उस दिन भी ज्योति बाबू टमाटर के पौधों में पानी लगाने के बाद अखबार पढ़ने बैठ गये थे। लेकिन यह क्या। अखबार पढ़ते-पढ़ते उन्हें गश आ गया। वे सोफे पर एक ओर को गिर गए। रोहिणी ने उनकी यह हालत देखी तो वे परेशान हो उठी। मन तरह-तरह की आशंकाओं से भर उठा। लेकिन रोहिणी ने जैसे ही पानी के चार-छ: छींटे ज्योति बाबू के मुँह पर मारे, उनकी मूर्च्छा टूट गई।
"क्या हो गया था आपको?"
"अब होने को रह ही क्या गया है रोहिणी?"
"ऐसा कौन-सा पहाड़ टूट गया ?"
"पहाड़ ही टूट जाता तो अच्छा था रोहिणी। हम तुम दोनों को स्थायी शान्ति तो मिल जाती।"
"आपको हुआ क्या है? साफ-साफ क्यों नहीं बताते?"
"रोहिणी पढ़ लो यह अखबार। तुम्हारे जीवंत का नाम दिल्ली में पड़ी बैंक-डकैती में आया है। आज से ही पुलिस वाले हमारा जीना हराम कर देंगे।"
खबर पढ़कर रोहिणी सकते में आ गई। ऐसा निकलेगा जीवन्त इसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी। किसी को मुँह दिखाने की स्थिति में नहीं बची थी।
शाम के पाँच बजते-बजते सचमुच दिल्ली पुलिस का दस्ता आ धमका ज्योति बाबू के घर पर। पुलिस की खबर लगते ही पूरा मुहल्ला जमा हो गया था वहाँ। इससे पहले कि पुलिस वाले किसी बदतमीजी पर उतरते, मुहल्ले के कई नामचीन लोग ज्योति बाबू के पक्ष में दृढ़ता से सामने आ गए। बड़े धैर्य के साथ ज्योति बाबू ने पुलिस-दल से घर के चप्पे-चप्पे की जाँच करवाई। लेकिन पुलिस को न तो जीवंत मिला और न लूटपाट का कोई कैश। अलबत्ता इस कार्यवाही में पुलिस-दल ने दो कमरों के ज्योतिबाबू के छोटे से फ्लैट को कबाड़खाना बनाकर रख दिया। लेकिन इससे कहीं-कहीं ज्यादा टीस हो रही थी ज्योति बाबू को अपनी इज्जत का कबाड़ा हो जाने से। अपनी ही आँखों में वे चोर और अपराधी अनुभव करने लगे थे। देर रात तक वे और रोहिणी घर का एक-एक सामान सहेजते रहे और सोचते रहे काश! जिन्दगी के क्षण भी इसी तरह से फिर से सहेजे जा सकते।
ज्योतिबाबू के अन्दर का अँधेरा और घना हो आया था। उनके दिमाग में पुलिस की यह हिदायत हथौड़े की तरह बार-बार चोट कर रही थी-अगर जीवन्त को मृतक होने से बचाना है तो उससे कहिए तुरन्त सरेण्डर कर दे।`
हफ्ते भर के अन्दर ही अखबारों में खबर आई कि जीवन्त ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया है। ज्योति बाबू आगे की किसी पुलिसिया जलालत से तो बच गए थे। लेकिन उन्होंने जीवंत की जमानत कराने से साफ इन्कार कर दिया।
रोहिणी का मन नहीं मान रहा था। उन्होंने तरह-तरह से ज्योति बाबू को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं पसीजे।
आखिर जीवन्त के ही किसी 'गॉड-फादर` ने उसकी जमानत भी करवा ली। जीवन्त अब लगातार ही बाहर रहने लगा था। यदाकदा उसके फोन आ जाते, "माँ मैं ठीक हूँ। आप कैसी हैं ? डैड कैसे हैं ?"
रोहिणी का मन बेटे से मिलने के लिए चीत्कार करके रह जाता। लेकिन जीवंत अपनी दुनिया में ही खोया हुआ था।
कुछ समय और बीता। एक दिन ज्योति बाबू ने देखा कि टमाटर की टहनी पर छोटा सा पीला फूल उभर आया है। धीरे-धीरे और भी कई टहनियों पर पीले फूल दिखाई देने लगे। कुछ दिनो के अंतराल पर ही उन फूलों के बीच सरसों जैसे छोटे-छोटे दाने बन गये। हफ्ते भर के अंदर ही इन दानों की शक्ल टमाटर जैसी लगने लगी। अब पौधों के पास बैठने से खट्टी-खट्टी सी खुश्बू आने लगी।
ज्योति बाबू टमाटर की इस उभरती फसल को देखकर निहाल होते जा रहे थे। सुबह का यही थोड़ा-सा समय, जब वे अपनी क्यारी में होते थे, उनके लिए प्रसन्नता का समय होता था। अन्यथा शेष समय जीवंत उनके दिल-दिमाग को मथता रहता था। शुरुआत में, कालेज के दिनों में कितना पैसा खर्च कर दिया था जीवन्त पर उन्होंने। रोहिणी तो बाद तक भी उसे खूब पैसे देती रही थी- उनसे नजरें बचा कर। उन्हें पता तो सब चल जाता था, लेकिन वे टाल जाते थे। आखिर रोहिणी कोई नादान तो थी नहीं।
मार्च के महीने में ज्योति बाबू की क्यारी में इतने टमाटर आ गये कि उन्हें लगने लगा कि अब बाजार से टमाटर नहीं खरीदने होंगे। अब इंतजार था तो सिर्फ टमाटरों के पकने का।
अब तक टमाटर के पौधे जमीन पर काफी क्षेत्रफल में सघनता से फैल गये थे। उनके बीच में फँसे मिर्च के दो पौधे काफी कृशकाय रह गये थे। ज्योतिबाबू बड़ी सावधानी से टहनियाँ उठा-उठा कर निरीक्षण करते और अनुमान लगाते कि कौन टमाटर कब तक पक जायेगा।
लेकिन एक दिन सुबह-सुबह जब वे क्यारी की तरफ गये तो ये देख कर हतप्रभ रह गये कि कई सारे कच्चे टमाटर अधखाये, इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। कई टहनियाँ भी टूटी-बिखरी पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने क्यारी में घूम-घूम कर खूब चहलकदमी की हो।
ज्योति बाबू ने रोहिणी को बुला कर टमाटर के पौधों की दुर्दशा दिखाई तो वे भी दुखी हो उठीं। लेकिन आस-पास पड़े मल से उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि शरारत बंदरों की है। ज्योति बाबू खीझ कर रह गये। उनका मन कचोट कर रह गया। उन्होंने पौधों में झाँक-झाँक कर देखा तो ऐसे कई टमाटर गायब थे, जिनके जल्दी पकने की उम्मीद थी।
आखिर वह दिन भी आया, जब ज्योति बाबू की क्यारी ने उन्हें पहला पका टमाटर दे ही दिया। ज्योति बाबू ने उस टमाटर को खूब अच्छा-सा धोया और प्लेट में सजा कर पूजा घर में भगवान के पास रख आये। रोहिणी ने इस दृश्य को देखा तो वे भावुक हो उठीं।
इधर जीवन्त की गतिविधियाँ लगातार समाचार-पत्रों की सुर्खियों का हिस्सा बन चुकीं थी। लूट, बलात्कार से लेकर हत्या तक के कई मामलों में उसका नाम आ चुका था।
घर तो वह महीनों से नहीं आया था, हाँ पुलिस जरूर बीच-बीच में आती रहती थी। पुलिस की इस आवाजाही में धीरे-धीरे मुहल्ले वाले भी ज्योति बाबू से मुँह चुराने लगे। ज्योति बाबू और रोहिणी अपने आप तक ही सीमित होते जा रहे थे। उन्होंने अपने मन को, हर हाल में जीने के लिए समझा लिया था।
ज्योति बाबू का टमाटर के पौधों को पानी देने का क्रम भी साथ-साथ चलता रहा।
क्यारी से कोई पन्द्रह दिन तक तो फल आते रहे। उसके बाद अचानक पौधों पर फूल आना ही बन्द हो गए। फूल नहीं तो फिर फल कहाँ से आएँगे।
धीरे-धीरे टमाटर के सारे पौधे बाँझ हो गए। ज्योति बाबू परेशान हो उठे। इतनी सारी मेहनत, इतनी देखभाल सबका क्या यही नतीजा निकलने वाला था। क्या जीवन्त की तरह ही इन पौधों के साथ की गई मेहनत भी अकारथ चली जायगी? ऐसी ही बातें सोच-सोच कर ज्योति बाबू लगातार दु:खी होते जा रहे थे।
फिर भी ज्योति बाबू इस उम्मीद में पौधों को पानी दिये जा रहे थे कि शायद उन पर फिर से फल आएँ। लेकिन उनकी इस आशा का कोई नतीजा निकलता नहीं लग रहा था। टमाटर के पौधे लगातर स्वस्थ होते जा रहे थे। लेकिन उनकी पत्तियाँ कुछ टेढ़ी-मेढ़ी होने लगी थीं। जैसे उनमें कोई रोग लग गया हो।
आशंकाग्रस्त ज्योति बाबू एक माली को बुला लाए। क्यारी देखते ही माली बोला -
"बाबू जी ! अब तो आप इस क्यारी से सब्जी की उम्मीद छोड़ ही दीजिए। लगता है आपने पौधों को पानी से खूब सींचा है। टमाटर को इतने पानी की जरूरत थोड़ी होती है बाबू जी? अब तो इन्हें उखाड़ कर फेंक ही दीजिए।"
ज्योति बाबू अपनी अनुभवहीनता को समझ गए। लेकिन उनका मन क्यारी को उजाड़ने का नहीं हो रहा था। जिस क्यारी को इतनी मेहनत से लगाया, पाला-पोसा, उसे ऐसे ही अपने हाथों से कैसे उजाड़ दें ?
कई दिन तक ज्योति बाबू की कश-म-कश चलती रही तभी एक दिन टेलीविजन में सी.बी.आई. की तरफ से जीवन्त की तस्वीर देखकर वे परेशान हो उठे। सी.बी.आई. ने जीवन्त को पकड़ने के लिए पचास हजार का इनाम घोषित कर दिया था।
अगले दिन सुबह उठते ही ज्योति बाबू ने टमाटर के सारे पौधों को उखाड़ कर फेंक दिया। रोहिणी ने देखा तो ज्योति बाबू के चेहरे से मुँह की सारी लकीरें गायब थीं ,जो टमाटर की एक-एक टहनी या फल टूटने पर उभर आती थीं।
दस बजते-बजते ज्योति बाबू स्थानीय अखबार के दफ्तर में थे। विज्ञापन-मैनेजर अभी आ नहीं पाया था। ज्योति बाबू गलियारे में बेंच पर बैठे ऊभ-चूभ करते रहे।
विज्ञापन मैनेजर के आते ही ज्योति बाबू भी उसके पीछे-पीछे अन्दर पहुँच गए।
"मुझे यह एक जरूरी विज्ञापन छपवाना है । कृपया बतायें इसमें कितना खर्च आएगा?"
"कैसा विज्ञापन है यह?....... क्या मैटर है?"
ज्योति बाबू ने कुर्ते की जेब से एक लिफाफा काँपते हाथों से निकाला और मैनेजर की ओर बढ़ा दिया।
लिफाफे में एक छोटी-सी तहरीर के साथ एक फोटो थी। तहरीर में लिखा था-
" मैं ज्योति प्रसाद खरे पुत्र श्री चन्द्रमा प्रसाद खरे निवासी ७२ यमुना कालोनी मथुरा, पूरे होश-हवास के साथ घोषणा करता हूँ कि आज से मेरे इकलौते पुत्र जीवन्त का मुझसे या मेरी पत्नी से कोई पारिवारिक सम्बन्ध नहीं रह गया है। उसके किसी भी कृत्य के लिए हम दोनों जिम्मेदार नहीं होंगे।"
" कौन है जीवन्त आपका?"- विज्ञापन मैनेजर किंचित परेशान होते हुए बोला।
" कोई नहीं!"- ज्योति बाबू का सपाट-सा जवाब था।
" यह तो आपको बताना ही होगा कि कौन हैं आप जीवन्त के ? कहीं आप ही तो नहीं हैं उसके पिता?"
" हूँ नहीं.... था....पिता ! "- ज्योति बाबू इतना-सा बोलकर चुप हो गए। उनकी आवाज भर्राने को हो आई थी, गला रुँध सा गया था।
विज्ञापन मैनेजर ने तहरीर के नीचे ज्योति बाबू का नाम लिखकर उनसे हस्ताक्षर करवाये और बगल के काउण्टर पर कैश जमा कराने का इशारा कर दिया।
ज्योति बाबू एक झटके से उठ खड़े हुए। विज्ञापन मैनेजर उन्हें बाहर जाता हुआ परेशान-सा देखता रहा और फिर बिसूरता -सा अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
ज्योति बाबू अखबार के दफ्तर से बाहर निकले तो उनके कदमों में नई तरह की दृढ़ता थी। उन्होंने एक रिक्शा लिया और सड़क पर चल रही ट्रैफिक का हिस्सा बन गए।
ज्याति बाबू घर पहुँचे तो न चाहते हुए भी वे क्यारी की तरफ चले ही गए। क्यारी के कोने में गड्ढे की तरफ टमाटर के उखड़े पौधे मुरझा रहे थे।
तभी उनकी निगाह मिर्च के दोनों कृशकाय पौधों की ओर चली गई।
पौधों के आस-पास की जमीन काफी खुश्क हो रही थी। उन्होंने लॉबी में पड़े लीड पाइप को नल की टोंटी में फिट करके पानी खोल दिया तथा मिर्च के पौधों को सिर से जड़ तक पानी से सराबोर करने लगे।
अचानक ही ज्योति बाबू को लगा कि मिर्च के दोनों पौधे दो नन्हें-मुन्ने बच्चों में तब्दील हो गए हैं ,जिन्हें वे किसी अनाथालय से उठा लाए हैं।
वे देर तक उन दोनो बच्चों को पानी से भिगोते-नहलाते रहे।
***

-कमलेश भट्ट कमल

Friday, August 12, 2005

चिट्ठी आई है....

-कमलेश भट्ट 'कमल'

शताब्दी एक्सप्रेस ठीक समय से चल पड़ी है। इसके अनुसार कानपुर पहुँचने का समय ११:१० है। लेकिन प्राय: यह समय से पहले ही पहुँच जाती है-जल्दी हो जाएगी। ऐसा पिछले अनुभव बतातें हैं। चलो अच्छा है,मक्खन से मुलाकात कुछ और जल्दी हो जाएगी। साल भर से अधिक समय हो गया है मक्खन से मिले। चिट्ठी मिल गई होगी तो वह स्वयं स्टेशन पहुँच जाएगा। रात फोन पर बात करने का कितना प्रयास किया,लेकिन फोन ही नहीं लग पाया। हर बार एक ही तरह का स्वर सुनाई देता रहा "कृपया डायल किया गया नबंर चेक कर लें"। टीप-टॉप दिख रहे गाँव में जब एक के घर कोई लड़की वाला शादी के लिए आता तो विरोधी खेमे वाले उसे भड़काने के लिए हर सूरत कोशिश किया करते। अपने विपक्षी के लड़के के बारे में सही गलत जोड़कर उसे बदचलन और आवारा बताना ऐसी कोशिश का प्रमुख अंग होता था उससे भी काम न चलता तो खानदान के बारे में ऐसे बीसियों ऐब गिना दिये जाते जैसे पिछली सात पुश्तें उनके ही आगे जन्मीं हो। इस कुचक्र में वे उनके नाते-रिश्तेदारों तक को भी नहीं बख्शते थे। इसी बीच वाक्पटु गाँव वाले अपने पक्ष के लड़को का बखान करना भी नहीं भूलते थे। इन सबका परिणाम यह होता कि लड़की वाले भाग खड़े होते थे। संभावित विवाह में अड़चन पैदा करने के ही मुद्दे पर गाँव में हुई कई-कई फौज़दारियों के मुकद्दमें आज भी कोर्ट में चल रहें हैं। ज़ाहिर है ऐसे गांव में बेटे की शादी किसी भी माँ बाप के लिए चुनौती बनी रहती थी और मक्खन की शादी भी ऐसे ही किसी दबाव में बहुत जल्दी हो गई थी।
यह तो गनीमत हुई कि शादी के समय ही मक्खन की बीवी उसके घर रहने के लिए नहीं आ गई, अन्यथा मक्खन की जिंदगी की जिंद़गी में जो घमासान तीन साल बाद शुरू हुआ, वह शादी के दिन से ही शुरू हो गया होता।
हुआ यह कि तीसरे साल जब मक्खन का गौना आया तब वह एम.ए. के पहले साल में था। मक्खन कोई बहुत खूबसूरत किस्म का तो लड़का था नहीं लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उसे बदसूरत कहा जा सके। लेकिन जब उसकी बीवी आई तो पता चला कि बहु पक्के रंग की कुछ-कुछ मोटी सी है और उम्र भी मक्खन से कुछ ज्य़ादा नहीं तो कम भी नहीं है। उसके दो-तीन दरजे तक पढ़े होने की बात का पता तो शादी के समय ही चल चुका था। लड़की का नाम लाली था लेकिन शारीरिक सुन्दरता की बहुत ही क्षीण लालिमा ही उसके अन्दर दिखाई देती थी। अत: मुँह दिखाई के समय ही मक्खन की माँ बिफर पड़ी-"हाय रे, खराब कर दई मेरे फूल जैसे बालक की जिंदगी। किस जन्म को बदलो चुकायो रे रमनथवा? फिर तो क्या गौने का उत्साह और क्या खुशी-सब ठप हो गया जैसे किसी ने टेप रिर्काडर स्विच बंद कर दिया हो।
लाली के साथ आई सगुन की मिठाई जिसमें से मक्खन की माँ ने गाँव वालों को बाँटने के लिए एक थाली में निकाला था आँगन में ही लाली की आँखों के सामने कुत्तों को डाल दी गई।
सारा माजरा सुनकर मक्खन सकते में आ गया। उसकी कल्पना में खूबसूरती की जो सीमाएँ थीं उसमें लाली कहीं फिट नहीं हो रही थी। लेकिन अब क्या हो सकता था यह तो शादी से पहले देखी जाने वाली बातें थी।
सुहागरात जैसी कोई उत्सुकता मक्खन में नहीं रह गई थी लेकिन मन के एक कोने में एक बात ज़रूर थी कि विधाता की सबसे खूबसूरत सृष्टि है तो लाली में भी कुछ न कुछ खूबसूरती तो होनी ही चाहिए। वह इस प्रतीक्षा में था कि कोई उसे किसी बहाने बुलाकर बहू के कमरे में ढकेल देगा और बाहर से कुण्डी चढ़ देगा। लेकिन पूरी रात वह यह प्रतीक्षा ही करता रह गया। कोई भी उसे बुलाने नहीं आया। मक्खन मन मसोसकर रह गया बल्कि उसके अन्दर एक अपराध-बोध सा भी भर गया कि दूसरे घर से आई लड़की उसके बारे में क्या-क्या सोच रही होगी।
अगले दिन गाँव की एक भाभी से चला कि मक्खन की माँ ने ही मक्खन को नहीं आने दिया था। यही नहीं उसने बहू को कोसते हुए कहा भी था,"ऐसी कुलच्छनी की घर में कोई ज़रूरत नायँ है,वह कल जानों चाय रही होय तो आज-ई चली जाय बाप के घर"।
ताज़ा 'ज़ख्म` है तो आज ज्यादा टीस है। कल से धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा यही सोचकर मक्खन चुप रहा। लेकिन एक एक करके तीन दिन बीत गए लेकिन मक्खन की मुलाकात लाली से नहीं हो सकी। धीरे-धीरे सब रिश्तेदार भी चलेगए। आखिर में चौथे दिन मक्खन ने खुद ही लाली से मिलने का निश्चय किया और खाना खा लेने के बाद खुद ही लाली के कमरे की ओर चल पड़ा।
चौकस पहरेदारी में लगी मक्खन की माँ झपटते हुए उसके सामने खड़ी होती हुई बोली-'लल्ला,उस भूतनी के पास जाने की कोई जरूरत नॉय। शादी हो गई सो हो गई। एक गलती के बाद दूसरी गलती ना करौ। जे चाहै तो बाप को बुलाकर अपने घर चली जावै। मैं तुम्हारी दूसरी शादी कराय दूंगी।"
"लेकिन अम्मा, शादी में लाली का क्या कसूर है? यही न कि वह खूबसूरत नहीं है-बदसूरत है। तो इससे तुम्हें क्या। लाली के साथ ब्याह मेरा हुआ है,मैं अपने साथ रखूंगा।" मक्खन को अपनी तरफ से सख्ती जरूरी लगी।
"लेकिन जग हँसाई तो हमारी है रही है लल्ला। जिसे देखो वई ताने मार रिया है कि इकलौती बहू वह भी भूतनी जैसी।" मक्खनी की माँ ने लड़का हाथ से जाते देख कहा।
"तो इस में लाली की क्या गलती है? क्या लाली जान बूझकर बदसूरत पैदा हो गई? पूछना है तो जाकर भगवान से पूछो कि वह किसी को खूबसूरत और किसी को बदसूरत क्यों बना देता है?"
मक्खन की माँ अपने बेटे के मुँह से पहली बार ऐसी ढिठाई भरी बातें सुन रही थी। वह खीझती ही खड़ी रह गई और मक्खन ने लाली के कमरे के अन्दर से कुण्डी चढ़ा दी।
मक्खन को अपने कमरे में अकेला पाकर लाली उसके पैरों पर भहरा पड़ी। मक्खन ने लाली को उठाकर अपने गले लगा लिया तो देर से रुकी लाली की आँखों से आँसुओं की लड़ी फूट पड़ी।
मक्खन ने लाली को समझा-बुझाकर शांत किया तो वह बोली- "आपने मेरे लिए अम्मा से इस तरह झगड़ा क्यों कर लिया? मैं तो जन्म से ही अभागन हूँ, नहीं तो जन्म के साथ ही माँ थोड़े मर जाती। आपने मुझे समझने की कोशिश की, यही क्या कम है। मैं तो स्वयं आपके जोग नहीं हूँ। लाली फिर सुबकने लगी थी।
"नहीं लाली,ऐसा नहीं कहते। ठीक है शरीर की सुन्दरता भी कोई चीज़ होती है लेकिन मन की सुन्दरता के बिना वह भी बेकार हो जाती है। मैं जानता हूँ तुम्हारा मन सुन्दर है। धीरे-धीरे मन की सुन्दरता ही तन की सुन्दरता बन जाएगी।"
तो कुछ इस तरह शुरूआत हुई थी मेरे दोस्त के दाम्पत्य जीवन की जिसके बारे में उसने गौने के बाद मुझसे हुई मुलाकात में विस्तार से बताया था।
फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था। अन्तत: संयोगवश हम दोनों को एक ही नौकरी मिली। आस-पास के इलाको में राजपत्रित अधिकारी बनने वाले हम दोनों 'पहले` थे। फिर तो ट्रेनिंग भी हम दोनों की साथ-साथ ही हुई। ट्रेनिंग के बाद मुझे दिल्ली में पोस्टिंग मिली और मक्खन को कानपुर भेजा गया।
उसके बाद दो-ढाई साल का वक्त कब बीत गया, इसका पता ही नहीं चला। इस बीच मेरी भी शादी हो गई। एक बच्चा भी हो गया। शादी में मक्खन से बातचीत का अवसर ही नहीं मिल पाया था व्यस्तता के कारण। उसके बाद मुलाकात का यह अवसर मिल पाया है। कानपुर में औद्योगिक प्रदूषण के अध्ययन का एक प्रोजेक्ट मुझे मिला है। अध्ययन की प्रांरभिक रूपरेखा प्रस्तुत करने के लिए सात दिन का समय मुझे दिया गया है, जिसके लिए इस यात्रा का अचानक कार्यक्रम बना।
ट्रेन अब तक लगभग पांच घण्टे का सफर तय कर चुकी है। सामने काफी दूरी पर एक ऊँची चिमनी धुआं उगलती हुई दिखाई देती है। ध्यान आया कि पनकी पावर हाउस है। इसी बीच ट्रेन में मधुर ध्वनि गूँजती है- "अब से कुछ ही देर में शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन उ.प्र. की औद्योगिक नगरी कानपुर पहुँचने वाली है। गंगा के पावन तट पर बसी यह नगरी
अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मभूमि रही है। यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित बिठूर..... "उद्घोषणा पूरी हुई नहीं कि लोग-बाग अपना सामान ठीक करने में लग गए। इस ट्रेन में ज्यादातर यात्री कानपुर के ही होते हैं। मैं भी अपना सामान सहेजने लग गया। ट्रेन की गति अब मंद पड़ने लगी है।
प्लेटफार्म पर मैंने ही मक्खन को देखा था। यानी मेरी चिट्ठी मक्खन को मिल गई थी।
मक्खन अपनी सरकारी गाड़ी ले आया था अर्दली भी साथ था। अर्दली ने लपक कर मेरा सामान ले लिया था। मुझसे हाथ मिलाते-मिलाते मक्खन ने कुछ इस तरह से गले लगाकर बांहों में कस लिया कि कुछ क्षण के लिए मैं कसमसाकर रह गया। दोहरी काठी के मक्खन की इस 'परपीड़` में उसकी आत्मीयता रची-बसी थी। "पी.के. मैं यह नहीं पूछूंगा कि तुम्हारी यात्रा कैसी रही। "गाड़ी की सीट पर बैठते हुए उसने एक खास अंदाज़ में यह बात कही। लगता है गांव का असर अभी बाकी है। पी.के. नहीं प्रवीण कुमार कहो।" हम दोनों का समवेत ठहाका एक साथ गूँजा।
"भाई मक्खन,तुम जो मेरे लंगोटिया यार ठहरे,तुम्हें भला अपने दोस्त के सुख-दुख से क्या मतलब।" मैंने दुबारा चुटकी ली थी।
"अच्छा तो ये अंदाज हैं जनाब के। किस शायर का असर हो रहा है?" मक्खन हल्के मूड में लग रहा था।"मैं और शायरी! क्या कमाल करते हो मक्खन।" हम दोनों का ठहाका फिर साथ-साथ गंूजा था।
मक्खन के घर पहुँचा तो मेरा स्वागत मक्खन के घर के कुछेक कर्मचारियों ने किया। जाहिर है इस स्वागत में अपनापन कम औपचारिकता ज्यादा थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी कैम्प ऑफिस में आ गया हूँ।
घर में खाना बनाने वाला एक महाराज था और अन्य घरेलू काम-काज के लिए एक नौकर। एक चपरासी को अपने कार्यालय से भी मक्खन ने बुलवा लिया था। मेरे खाने और चाय आदि की विधिवत हिदायत देकर, मेरे साथ चाय पीने के बाद मक्खन ऑफिस चला गया और जाते-जाते बोल गया था कि शाम का खाना साथ ही खाएगा।
यात्रा की थकान यूँ तो कुछ खास नहीं थी, लेकिन सुबह जल्दी ट्रेन पकड़ने की चिंता में रात तीन बजे ही आंख खुल गई थी। अत: शरीर पर खुमारी का असर था। अत: खाना खाकर मैं आराम करते-करते सो गया।
जब तक मेरी नींद टूटी,मक्खन भी ऑफिस से वापस आ गया था।
"अरे,तुम ने तो देर से आने की बात कही थी इतनी जल्दी कैसे?" मैंने पूछा।
"हां एक मीटिंग थी। बॉस के आने से मीटिंग केंसिल हो गई। मक्खन ने बात स्पष्ट की थी और साथ ही महाराज को आवाज देते हुए बोला-महाराज तुम फटाफट चाय नाश्ता लाओ हम लोग घूमने जाएंगे।
कौन सी जगह घुमाओंगे मुझे?
प्रवीण तुम पहली बार इत्मीनान से कानपुर आए हो। शुरूआत जे.के. मंदिर से ही करेंगे। फिर मोती झील की हवाखोरी करेंगे और बाद में मालरोड घूमते हुए वापस आ जाएगे। मक्खन ने जैसे पहले ही सोच रखा हो।
जब तक मैं फ्रेश होकर बाथरूम से बाहर आया- चाय तैयार हो चुक थी। ड्रायवर गाडी साफ करने में लग था चाय पीकर हम दोनों गाड़ी में बैठ गये।
जे.के. मंदिर के दर्शन के बाद मुख्य द्वार के बाहर संगमरमर से बने दूधिया फर्श पर हम दोनों न चाहते हुए भी बैठ गए थे। फर्श की शीतलता अपूर्व सुख की अनुभूति दे रही थी।
"मक्खन यहाँ आने के बाद से एक बात मैं बड़ी देर से सोच रहा हूँ लेकिन तुम अपनी तरफ से कोई पहल ही नहीं कर रहे हो।
ऐसी भी क्या बात है?
"भाभी के क्या हाल चाल है? कहीं विवेक की तरह तुमने भी तो नहीं?" मैं कहते कहते संकोच में पड़ गया।
क्या किया विवेक ने? मक्खन का चेहरा आशंकाग्रस्त हो आया था।
"तो तुम्हे पता नहीं"
"मक्खन, हम लोग भगवान के घर में हैं। फिर तुमसे झूठ और छिपाव क्या।"अफसर बनने के बाद उसने अपनी बीवी बदल ली।
"क्या मतलब?"
"मतलब यह है कि उसने एक और बीवी 'रख` ली है। पहली बीवी अब गाँव में रहती है। शहर के लिए उसने एक दूसरी लड़की को बीवी की तरह रख लिया है और तो और सालों से गाँव भी नहीं गया हैं। माँ बाप बहुत दुखी और चिंतित रहते हैं।
लेकिन उसकी पहली बीवी बुरी तो नहीं थी।
विवेक कहता है कि वह बैकवर्ड लगती है। उसकी सोसायटी में फिट नहीं बैठती नयी वाली बीवी क्रिश्चियन है। जींस टॉप वाली।
"अरे हां मक्खन तुम भाभी वाली बात टाल ही गए। कहां है भाभी? ठीक तो हैं न? जे.के. मंदिर घुमाया या नहीं
नहीं प्रवीण,लाली घर पर ही रहती है। एक बच्चा भी है सोचता हंू कुछ और बड़ा हो जाए तो अपने पास ले आऊँ और किसी स्कूल में डाल दूँ।
"और भाभी?"
"लाली तो गाँव में ही रहेगी। माँ भी तो है न । जब तक माँ है। माँ को अकेले तो नहीं छोड़ा जा सकता न।"
"लेकिन माँ तो भाभी को बहुत प्रताड़ित करती होगीं?"
"तो क्या हुआ। जो माँ को करना है वह माँ कर रहीं हैं जो लाली को करना चाहिए वह लाली कर रही है। माँ हम लोगों
के लिए अच्छा करें तभी हम लोग उसके लिए कुछ करें यह तो कोई बात नहीं हुई। अपने कर्तव्य के निर्वाह में कैसी शर्त और कैसा संकोच।"
"तो क्या माँ ने भाभी को स्वीकार कर लिया?"
बिल्कुल नहीं। वह अब भी लाली से उतनी ही नफरत करती हैं। यही नही नौकरी मिलने के बाद एक बार फिर माँ ने कोशिश की थी कि लाली को छोड़ दूं। लेकिन मेरी तरफ से हरी झण्डी न पाकर चुप हो गई।
"विश्वास नहीं होता मक्खन कि एक औरत किसी दूसरी औरत के खिलाफ इस हद तक भी जा सकती है।"
"मेरा दुर्भाग्य है प्रवीण और कुछ नहीं। तुम्हीं बताओ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं लाली की किस्मत से ही नौकरी पाने में सफल हुआ हूँ। मुझे माँ के ऊपर तरस आता है कि जो बहू उनकी तमाम गाली गलौज के बाद भी पूरे मन से उनकी सेवा में लगी रहती है उससे अच्छी बहू कौन हो सकती है यह जरा सी बात भी उनकी समझ में नहीं आती।"मक्खन थोड़ा सा भावुक हो उठा। गले में जैसे कुछ आकर फँसने सा लगा था। कुछ क्षण की चुप्पी के बाद वह फिर बोला-सच कहूँ प्रवीण भाई लाली की जिस्मानी सुन्दरता को लेकर मेरे मन में भी एक कुण्ठा हो जाया करती है लाली मेरी इस कुण्ठा को समझती है। शायद इसीलिए मेरे एक दो बार कहने पर भी वह मेरे साथ शहर आने के लिए राजी नहीं हुई। बस चिट्ठी-पत्री आती रहती है। साल छ: महीने में मैं भी गांव हो आता हूँ।"
मक्खन को लगा कि जैसे बहुत देर हो गई। झटके से अपनी बात पूरी करते वह उठ खड़ा हुआ। मैं भी उठ खड़ा हो गया। रात हो जाने के कारण चारों कोनों से पड़ने वाली सोडियम लैम्प की लाइट में मंदिर की आभा स्वर्णिम हो आई थी।
घर वापसी तक रात के नौ बज चुके थे। मक्खन तो फ्रेश होने चला गया और मैं उसके ड्राइंग रूम का जायजा लेने लगा।
अचानक एक रैक से इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका का एक वाल्यूम निकालते हुए कई लिफाफे गिरकर फर्श पर बिखर गए। उत्सुकतावश मैंने उन्हे उठा लिया। सभी लिफाफों पर एक ही जैसी लिखावट थी तथा सभी डाक से आए थे। थोड़ा ध्यान से देखा तो सभी लिफाफों पर भेजने वाले का नाम अंग्रेजी में लिखा था।
हैं! भाभी ने अंग्रेजी सीख ली! और मक्खन ने बताया तक नहीं। बड़ा छुपा रूस्तम है। मेरे मन के कोने में हलचल सी हुई। तभी मेरा ध्यान गया कि लिफाफे तो अभी खोले ही नहीं गए हैं। मैं अचानक किसी उलझन में फँस गया। खैर पूछूँगा बच्चू से। मैं यह सोच ही रहा था कि मक्खन वापस आ गया।
मैंने नाराजगी भरे स्वर में उससे शिकायत की -"मिस्टर मक्खन लाल जी भाभी की इतनी सारी चिट्ठिया आईं और तुम ने उन्हें खोलकर पढ़ने तक की ज़रूरत नहीं समझी। एक तरफ तो भाभी के हमदर्द बनते हो और दूसरी तरफ ऐसी निठुरता। इसे मैं तुम्हारी कुण्ठा समझूँ या हिकारत। भाई माजरा क्या है?"
"चलो तुम्हीं खोलकर देख लो माजरा समझ में आ जाएगा" मक्खन गंभीर हो गया।
"तो ये बात है!" कहते हुए एक-एक कर सारे लिफाफे मैंने खोल डाले। लेकिन ये क्या? सभी लिफाफों में पत्रों की जगह मुडें हुए सादे कागज भर निकले।
"इन में तो कुछ लिखा ही नहीं है?" मैं हैरान था।

"फिर?"मेरी उलझन बढ़ रही थी।
"प्रवीण, तुम तो मेरे अपने हो। तुम से क्या छिपाना। जब मैं घर जाता हूँ तो अपना पता लिखकर तथा भेजने वाले कि जगह लाली का नाम लिख कर कुछ टिकिट लगे लिफाफे रख आता हूँ। लाली महीने भर में उन्हीं लिफाफें में सादे कागज रख कर मेरे पास भेजती रहती है। अनपढ़ जैसी होने की वजह से कुछ लिख नहीं पाती। इन पत्रों को पाकर मुझे लगता है कि लाली सही सलामत है,ज़िंदा है।
मक्खन के स्पष्टीकरण से मैं ठगा सा रह गया।
उधर मक्खन की पलकों में आँसू की कुछ बूँदें आकर ठहर गयीं थीं।
***
-कमलेश भट्ट 'कमल'